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दीपक का अंधकार से लड़ने का संकल्प

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सूर्यदेव ने अपनी अंतिम किरणें समेट लीं। चारों ओर घना अंधकार छा गया। प्रकाश की कोई किरण नहीं दिखाई दे रही थी। सूर्य के अस्त होते ही सर्वत्र नीरवता छा गई। अंधकार की घनी तमिस्रा को देखकर भयाक्रांत हुए सभी एक स्वर से बोल उठे अब क्या होगा ?सर्वत्र अपना ही साम्राज्य देखकर अंधकार गर्वोन्मत्त हो उठा। उसने बड़े दर्प के साथ घोषणा की— ” मैंने प्रकाश को जीत लिया है। सूर्य को, प्रकाश के अस्तित्व को समाप्त कर दिया है। उनका अवसान हो गया। अब तो सर्वत्र मेरी ही सत्ता है, राज्य है। प्रसन्न होकर बोला, अब मेरी ही पूजा-अर्चना होगी।”एक छोटा दीपक अंधकार की दर्प भरी बातें सुन रहा था, उसने सोचा प्रकाश के अभाव में कहीं अंधकार सचमुच ही आधिपत्य न जमा ले। भयातुर संसार का कौन मार्गदर्शन करेगा? उसने अंदर झाँका तो पाया कि नन्हा हुआ तो क्या हुआ, वह भी कुछ कर सकता है। अपनी नन्हीं लौ को उसने बाहर किया, प्रकाश किरणें बिखेरते हुए अंधकार से बोला “तुम्हारा यह अहंकार मिथ्या है। तुम्हारा कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। हमारी अनुपस्थिति तुम्हारी सत्ता का कारण बनती है। सूर्य न सही, किंतु जब तक हम हैं, प्रकाश मिट नहीं सकता।”दीपक की बात सुनकर अंधकार अट्टहास कर उठा और कहने लगा- “इस तुच्छ से दीपक की इतनी धृष्टता, इतना साहस । प्रकाशपुंज विशाल सूर्य को तो निगलते मुझे देरी नहीं लगी, मेरे आते ही उसका अवसान हो गया। फिर इसकी क्या विसात, जो मुझसे संघर्ष कर सके। अंधकार ने क्रुद्ध होकर अपनी कालिमा और घनी कर दी। नन्हें दीपक की प्रकाश-किरणों को ढकने का प्रयत्न करने लगा।” नन्हा दीपक तनिक भी भयभीत न हुआ। उसे अपने पुरुषार्थ पर विश्वास बना रहा। स्थिर लौ से सतत प्रकाश बिखेरता रहा। समय बीतता जा रहा था।अंधकार तीव्र वेग से अपनी गहनता और भी बढ़ाता जा रहा था। बढ़ती हुई कालिमा का नन्हें दीपक पर थोड़ा भी प्रभाव न पड़ा। दृढ़ संकल्पों से युक्त, अटूट निष्ठावान साधक की भाँति वह अपने लक्ष्य में जुटा रहा और स्वर्गीय लौ से प्रकाश फैलाते हुए भयाक्रांतों को पथ दिखाता रहा। रात बीतती जा रही थी। धीरे-धीरे एक, दो तथा तीन पहर रात्रि समाप्त हो गई और यह नन्हा साधक अंधकार से जूझने के लिए लड़ता रहा। अंधकार ने अपनी सारी शक्ति लगा दी, किंतु नन्हें दीपक को पराजित न कर सका। वह छोटा प्रकाश स्त्रोत अविचल भाव से जलता रहा और सतत प्रकाश बिखेरता रहा। अंधकार नन्हें दीपक के प्रचंड पुरुषार्थ, ध्येय, निष्ठा एवं साहस को देखकर भयभीत हो उठा। जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था, उसका डर और भी बढ़ता जा रहा था।रात्रि का अंतिम पहर बीता और पूरब दिशा से उषा का आगमन प्रारंभ हो गया। प्रभात में सूर्यदेव की स्वर्णिम किरणों से अपनी सुरक्षा करने के लिए अंधकार कूच करने लगा। सर पर पाँव रखकर भाग गया। भगवान सूर्य को नन्हें दीपक ने अभिवादन किया और निवेदन किया- “हे ज्योतिपुंज! संसार के प्रकाश स्त्रोत आप महान हो। अब अपनी आभा से जगत् को प्रकाश दो।”जलते हुए नन्हें दीपक की अनवरत साधना, त्याग एवं बलिदान के समक्ष भगवान सूर्य भी नत मस्तक हो उठे। उनकी आँखों में स्नेह की अश्रुधारा बहने लगी। प्यार से दीपक पर हाथ थपथपाते हुए उन्होंने कहा- “तुमने अपनी सतत साधना से प्रमाणित कर दिया कि प्रकाश कभी पराजित नहीं हो सकता। महान तुम हो। तुम्हारा त्याग अनुकरणीय होगा। तुम्हारी महानता के समक्ष मैं नत-मस्तक हूँ। मेरा प्रणाम – अभिनंदन स्वीकार करो।” नन्हें दीपक ने संतोष की साँस ली और अपनी लौ को समेटते हुए विश्राम को चल पड़ा।युग निर्माण योजनानवंबर 2021

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