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विवेक की कसौटी भाग ३

by Akhand Jyoti Magazine

विवेक से ही धर्म का निर्णय हो सकता है

‘धर्म’ शब्द बड़ा विस्तृत है । अन्य देशीय विद्वानों की बात छोड़ भी दें तो हमारे ही देश के प्राचीन और अर्वाचीन विद्वानों ने धर्म की बहु संख्यक व्याख्यायें की हैं, पर अविद्या के कारण आजकल हमारे देश की सामान्य जनता में यह भ्रम फैल गया है कि ‘शास्त्र’ नाम की जितनी भी पुस्तकें हैं, उनमें जो कुछ भी कहा गया है, लिखा गया है अथवा वर्तमान समय में छाप दिया गया है, वह सब कुछ धर्म है, पर जैसा हम पहले बता चुके हैं, शास्त्रों की रचना भिन्न-भिन्न कालों में परिस्थिति के अनुसार होती रहती है, इसलिए उनमें स्वभावतः अनेक प्रकार की परस्पर विरोधी जान पड़ने वाली बातें पाई जाती हैं । इसके सिवा अनेक विदेशी लोगों ने पिछले डेढ़-दो हजार वर्षों के भीतर गुप्त रूप से अपने मतलब की बातें प्राचीन शास्त्रों में मिला दी हैं । मनुष्यो ! इस प्रवृत्ति को समझकर हमारे पूर्वजों ने स्पष्ट कह दिया था कि धर्माधर्म का निर्णय करने के लिए शास्त्रों के प्रमाणों के साथ ही अपनी विवेक बुद्धि से भी काम लेना अनिवार्य है और जहाँ शास्त्र की बातें विवेक बुद्धि से स्पष्ट असंगत जान पड़ें वहाँ उन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए । मनुष्य की आत्मा, परमात्मा का अंश है और वही सर्वत्र सब पदार्थों और कार्यों में समाया हुआ है। इसलिए मनुष्य यदि आत्मा को निर्मल बनाकर उसकी शक्ति अर्थात विवेक द्वारा विचार करे तो कोई कारण नहीं कि वह सत्य धर्म का निर्णय न कर सके । उपनिषदों में कहा गया है-

ब्रह्म……… सर्वमावृत्तय तिष्ठति

ब्रह्मेव सर्वाणि नामानि सर्वाणि

रूपाणि सर्वाणि कर्माणि बिभर्ति

सोऽयमात्मा सर्वानुभूः

अर्थात- “सब पदार्थों को घेर कर लपेटकर, ब्रह्म बैठा है । सब नाम, सब काम, सब रूप उसी एक ब्रह्म के ही “में” हैं । वही आत्मा “में” सब अनुभवों का अनुभव करने वाला है ।”

पुराणों में भी कहा है-

सर्बंधीवृत्तयनुभूतसर्वः

श्रद्धत्स्वाननुभूतोऽर्थो मनः स्प्रष्टमहति

                                                      – भागवत

यस्मिन् देशे काले निमित्ते यो धर्मोऽनुष्ठीयते

एव देशकालनिमितांतरेष्वधर्मो भवति ।।

                                                                            – शांकर- शारीरिक भाष्य, ३१, २५

अर्थात- “अधिकारी के भेद से धर्म में भेद होता है। देश, काल, निमित्त के भेद से धर्म में भेद होता है । जिस स्थान पर खड़े होकर देखते हैं, उस स्थान के बदलने से दर्शन अर्थात् दृश्य का रूप बदल जाता है।” जो ही एक देश, काल, पात्र, निमित्त और कर्म के विशेष से एक आदमी के लिए धर्म है, वही दूसरे आदमी के लिए दूसरे देश, काल, पात्रता, निमित्त और कर्म के विशेष से अधर्म होता है । केवल एक – दो ग्रन्थ पढ़ लेने से धर्म का पता नहीं लगता, अच्छी अवस्था का धर्म दूसरा और विषम अवस्था का धर्म दूसरा होता है ।

बच्चों को मिट्टी का खिलौना ही अच्छा लगेगा, उनको रेखा गणित और बीजगणित पढ़ाने का यत्न करना व्यर्थ है ।

यही दशा मतों की, सम्प्रदायों की, पन्थों की है l

मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना

भिन्नरुचिर्हि लोकः ।”   इत्यादि

अब बचपन बीत जायगा, तब मिट्टी के खिलौने आप ही छूट जायेंगे और दूसरे प्रकार के खिलौनों में मन लग जायगा ।

अप्सु देवा मनुष्याणां दिवि देवा मनीषिणाम्

बालानां काष्ठ लोष्ठेषु बुघस्यात्मनि देवता

उत्तमा सहजाऽवस्था, द्वितीया ध्यान धारणा,

तृतीया प्रतिमा पूजा, ह्येमयात्रा चतुर्थिका

अर्थात् – “बालकों के देवता काठ पत्थर में, साधारण मनुष्यों के जल में, मनीषी विद्वानों के आकाश में हैं, बुध का – बोध वाले का, ज्ञानवान का देव आत्मा ही है । सहज अवस्था, अर्थात् सब दृश्य संसार को ही परमात्मा का स्वरूप जानना, यह उत्तम कोटि है, विशेष ध्यान धारणा करना, यह उससे नीची दूसरी कोटि है, प्रतिमाओं की पूजा तीसरी कोटि है, होम और यात्रा चौथी कोटि है ।

बाल – बुद्धि जीव, जिनकी बुद्धि सर्वथा बहिर्मुख है, जो इन्द्रियग्राह्य आकार ही का ग्रहणकर सकते हैं, वे अपने मन का सन्तोष काष्ठ-लोष्ठ की प्रतिमा से ही करें। यह बहिर्मुख माया रोग मनुष्य का ऐसा बढ़ा हुआ है कि मुसलमान धर्म में भी, यद्यपि वह अपने को बढ़ा भारी बुतशिकन यानी मूर्ति तोड़ने वाला कहता है, लोग देवालयों को तोड़कर मकबरे और कब्र बनाते और पूजते हैं । किसी उर्दू शायर ने ही कहा है-

जिन्दगाहें तोड़ करके मुर्दगाहें भर दिया

इसी बहिर्मुख माया का वर्णन उपनिषदों ने किया है ।

परांचि खानि व्यतृणत स्वययंभूः

तस्मात पराड् पश्यति नान्तरात्मन्

कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष-

वृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्

                                                                                           – कठोपनिषद्

अर्थात् – स्वयंभू ने ब्रह्मा ( श्रृष्ट युन्मुख, रजः प्रधान महत्तत्त्व, बुद्धितत्त्व ), ने सब इन्द्रियों को, छिद्रों को बाहर की ओर खोला, छेद करके निकाला । इसलिए जीव बाहर की वस्तु देखता है, भीतर अपने को नहीं देखेता । कोई-कोई धीर, विरक्त जीव, संसार की दौड़ धूप, आवागमन और मृत्यु से थककर विश्राम और अमरत्व को चाहकर, आँख भीतर फेरता है और प्रत्यगात्मा को देखता है ।

पर हाँ, उन बालकों के जो रखवारे वृद्ध बुजुर्ग हैं, उनको यह फिक्र रखनी चाहिए कि बीच-बीच में मिट्टी के खिलौनों के खेल के साथ-साथ कुछ अक्षर ज्ञान भी दिखाते जाएँ, कुछ पुस्तकों का शौक पैदा कराने का यत्न भी करते रहें । यह न चाहें कि लड़के सदा खिलौनों में ही खुश रहें, मूर्ख बने रहें, पोथी- पत्रा कभी न छुएँ और हम उनको हमेशा बेवकूफ रखकर अपना गुलाम बनाये रहें ।

और भी यदि ये वृद्ध, सात्विक बुद्धि वाले और लोक हितैषी हों तो इस खिलौना पूजा को भी बहुत शिक्षाप्रद, उत्तम, सात्विक भाववर्द्धक, कला वर्द्धक, शिल्प वर्द्धक, शास्त्र प्रवर्तक बना सकते हैं । सुन्दर मन्दिरों से ग्राम की, नगर की, शोभा सौन्दर्य बढ़ा सकते हैं और उनसे पाठशाला, चिकित्सालय, पुष्पवाटिका, उद्यान, चित्रशाला, संगीतादि विविध कलागृह, सार्वजनिक सभामण्डप, सम्मेलन – स्थान, व्याख्यानशाला, आदि का काम ले सकते हैं । योग साधनादि में भी ये मन्दिर सीढ़ी का काम दे सकते हैं । क्योंकि

तच्छूयतामनाघारा धारणा नोपपद्यते

अर्थात- ध्यान धारणा प्रायः किसी मूर्त्त विषय के बिना नहीं सघती ।

और भी तरह-तरह के उत्तम वैधानिक शास्त्रानुकूल, आधिदैविक शास्त्र सम्मत, आधिभौतिक शास्त्र सम्मत, काम लिए जा सकते हैं । यह याद रखते हुए और यह समझते हुए कि सारा साकार जगत ही उस जगदात्मा का रूप है, जनता को क्रमशः इस मूर्त रूप की ओर ले जाना उचित ही है और इस दृष्टि से मूर्ति पूजा की निन्दा करना अनुचित ही है । दूसरे दर्जे की बुद्धि के लिए जलमयु, तीर्थ, सरिता, सरोवर आदि की अनुज्ञा दी गई है । अदृष्ट फल वे हैं, जिनसे सूक्ष्म शरीर मनोमय अथवा विज्ञानमय कोष, अर्थात् अन्तःकरण, मन, बुद्धि, अहंकार, का संस्कार हो ।

दृष्ट फल वे हैं, जिनका प्रभाव स्थूल शरीर पर पड़ता है । इन तीर्थों में भ्रमण करने से, देशाटन के जो शिक्षाप्रद बुद्धि की उदारता बढ़ाने वाले, संकोच हटाने वाले, फल हो सकते हैं वे होने चाहिए । यदि तीर्थ- रक्षक और पुजारी और भिखमगे लोग ‘कौआरोड़’ करके यात्रियों की जान आपत्ति में न डाल दें और तीर्थों के जलों में फल, फूल, पत्ता, कच्चा और पक्का अन्न डलवा – डलवाकर पानी को सड़ाकर हानिकर न कर डालें । स्वयं पुराणों ने कहा है ।

ह्यम्मयानि तीर्थानि, देवा मृच्छिलामयाः

ते पुनंत्युरुकालेन, दर्शनादेव साधवाः

तेषामेव निवासेन, देशास्तीर्थोभवन्ति वै ।।

                                                                                               –भागवत

अर्थात्- “जल में तीर्थ नहीं बनते, न देवता मिट्टी और पत्थर से बनते हैं । उनकी उपासना करने से बहुत काल में मन की शुद्धि होती है, पर सच्चे साधुओं के तो दर्शन और सत्संग से ही चित्त सद्यः शुद्ध हो जाता है ।”

 तीर्थ-स्थानों में जो सच्चे साधु तपस्वी विद्वान बसते हैं, वे ही तीर्थ के तीर्थंकर हैं, तीर्थों को तीर्थ बनाने वाले हैं । जो शोक के पार तारे वह तीर्थ ( तरति शोकं येन सहायेन स तीर्थः ) सप्त पवित्र पुरी आदि तीर्थ इसी हेतु से तीर्थ थीं, कि वे उत्तम विद्यापीठ का काम देती थीं । वहाँ की हवा में भक्ति, विरक्ति, ज्ञान भरा रहता था, क्योंकि इनके बताने और जगाने वाले साधु, तपस्वी, विद्वान, पण्डित, बहुतायत से वहाँ वास करते थे । जैसे आजकल की यूनिवर्सिटियों में किसी एक में एक ही शास्त्र की, किसी दूसरे में दूसरे शास्त्र की विद्या पढ़ाई, चर्चा, हवा आधिक रहती है । किसी शहर में किसी विशेष व्यापार की, किसी में कल-कारखानों की बहुतायतें रहती हैं और वहाँ जाने से उसके सम्बन्ध की विद्या सहज ही में आ जाती है । इसी तरह ‘काश्यां मरणान् मुक्तिः” काशी में मरने से मुक्ति होती है, क्योंकि वहाँ आत्मज्ञान सहज में साधुओं से मिलना चाहिए, चारों ओर उसकी चर्चा होने से मानो हवा में भर रहा है और “ऋते ज्ञानाम् न मुक्तिः”, बिना ज्ञान के छुटकारा नहीं, किसी प्रकार को भी गुलामी और बन्धन से, सामाजिक से, अथवा राजनीतिक से अथवा सांसारिक से, पर आज कल इन पवित्र पुरियों की जो दुर्गति है, वह प्रत्यक्ष है । जो मनुष्य ‘काश्यां मरणान् मुक्तिः’ के अक्षरों को ही पकड़े रहते हैं और उसके हेतु को नहीं पकड़ते और आत्म ज्ञान का संचय नहीं करते, उनके लिए मुक्ति की आशा नहीं है ।

तीसरे दर्जे की बुद्धि के लिए, “दिवि देवाः” सूर्य, चन्द्र, बृहस्पति प्रत्यक्ष देवता हैं । इनकी उपासना गणित – फलितात्मक, अद्भुत ज्योतिष शास्त्र की उपासना, ‘मिटियोरोलोजी’ ‘आस्ट्रोनोमी आदि है । इससे जो कुछ काल- ज्ञान में, कृषि में, समुद्र यात्रादि में सहायता मिल सके वह सब इनकी उपासना का दृष्ट- फल है, पर सहायता के स्थान में जो विघ्न ज्योतिष शास्त्र के कुप्रयोग से हो रहे हैं, वह सबको विदित हैं ।

चौथी और अन्तिम कोटि “बुधस्य आत्मनि देवता” जिसको यह विचार उत्पन्न हो गया है कि यह देवता है या नहीं है, यह पुस्तक मानने योग्य है या नहीं है, यह ऋषिवत या अवतारवत या रसूल पैगम्बरवत या मसीहक्त गुरुवर मानने योग्य है या नहीं है, यह धर्म मानने योग्य है या नहीं है, यह छोड़ने योग्य है या ओढ़ने योग्य है, यह शास्त्र है या अशास्त्र है, यह वेद है या अवेद है, इसका अर्थ यह है या दूसरा है, अन्ततोगत्वा कोई ईश्वर है या नहीं है और है तो क्या ? उसका स्वरूप क्या है – इस सबका अन्तिम निर्णेता मैं ही हूँ, “मैं” ही है, आत्मा ही है जिसको यह विचार दृढ़ हो जाता है, उसके लिए ‘बुघस्य आत्मनि देवता”, अर्थात् बुघका, बुद्धिमान का, देव स्वयं आत्मा ही है । परम ईश्वर, ईश्वरों का ईश्वर, ‘मैं’ ही । इस काष्ठा को जो पहुँचा है उसके लिए सुरेश्वराचार्य ने वृहदारण्यक वार्तिक में कहा है- “एतां काष्ठामवष्टभ्य सर्वा ब्राह्मण उच्यते ।” जो ही जीव इस काष्ठा को पहुँचा है वह ब्राह्मण है, और वही ब्राह्मण है, अथवा ब्रह्मस्वरूप है ।

उसके लिए “काश्यां मरणान् मुक्ति” की आवश्यकता नहीं, किन्तु,

भावना यदि भवेत फलदात्री मामकं नगरमेव हि काशी

व्यापकोऽपि यदि वा परमात्मा तारकं निमिह नोपदिशेन नः ।।

अर्थात- भावना ही यदि फल देने वाली है, तो जिस स्थान पर मैं हूँ, वही काशी है । यदि परमात्मा व्यापक है, तो यहीं पर तारक यन्त्र मन्त्र का उपदेश कर सकता है । ऐसे ही मनुष्य के लिए याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा है कि वह स्वयं नयी आवश्यकता पड़ने पर नया धर्म बना सकता है ।

चत्वारो वेदधर्मज्ञः पर्वत, त्रैविद्य मेव वा

सा ब्रूते धर्मः स्यादेको वाऽऽध्यात्मवित्तमः ।।

अर्थात- “वेद पर, ज्ञान – समूह पर प्रतिष्ठापित जो धर्म है, उसके जानने वाले चार मनुष्यों की मण्डली अथवा अंगोपांग सहित तीन वेदों को अच्छी तरह जानने वालों की समिति अथवा एक अध्यात्म-वित्तम, ब्रह्मविद्वरिष्ठ तत्त्वतः ब्रह्मज्ञान के हृदय में प्रविष्ट, यानी मनुष्य, जो निर्णय कर दे, कि यह धर्म होना चाहिए, वही धर्म माना जाय ।”

विवेक और मानसिक दासता

विवेक की हीनता के कारण मनुष्य परमुखापेक्षी और पराश्रित हो जाता है । वह अपने को सब प्रकार से गया बीता समझ लेता है । उसके हृदय में प्रायः यही विचार आया करता है कि “जो कुछ हमारे पूर्वज कर चुके हैं, जो कुछ हमारे समाज के ‘बड़े आदमी कर रहे हैं, उससे ज्यादा हम क्या कर सकते हैं । हमको तो यथाशक्ति उनका ही अनुकरण करना चाहिए ।” ऐसी मनोवृत्ति से हद दर्जे की मानसिक निर्बलता उत्पन्न होती है और उन्नति का मार्ग रुक जाता है ।

मानसिक दासता सब प्रकार की दासताओं की जननी है । जब शरीर का चालक मन अशक्त है तो शरीर का अणु- अणु अपाहिज है । उसकी शक्ति को प्रकाशित होने का कोई विशिष्ट मार्ग नहीं, उसका कोई निश्चित उद्देश्य नहीं । वह एक ऐसी नौका है जो जिधर चाहे बहक सकती है ।

समस्त मानव जीवन की प्रवर्तक ‘भावनाएँ होती हैं । इन भावों का अनुसरण हमारी मूल प्रवृत्तियों किया करती हैं । भावनाएँ मन में विनिर्मित होती हैं । उनका उच्चाशय या निंद्य स्वरूप मन की प्रेरक शक्तियों पर अधिष्ठित है।

मन के अपाहिज हो जाने पर आत्मा जड़ से गया बीता हो जाता है । उसकी महत्वाकांक्षा का निरन्तर क्षय होता रहता है । आशाओं पर तुषारापात होता है । ऐसा व्यक्ति नहीं जानता कि वह क्या है ? इसका वास्तविक स्वरूप क्या है ? उसे किस दिशा की ओर अग्रसर होना है ? दासता की कुलिश – कठोर बेड़ियों में जकड़ा हुआ मन स्वयं अपना ही नहीं, अपने स्वामी का भी सर्वनाश कर देता है ।

हम दूसरों को डरपोक देखते तो समझ लेते हैं कि ऐसे ही हमें भी होना चाहिए । ऐसा ही मनुष्य का वास्तविक स्वरूप है। हम अपने चारों ओर ऐसा ही कृत्सित वातावरण देखते हैं। हम विगत कटु अनुभवों को अपेक्षाकृत अधिक महत्व देते हैं । हम स्वयं विचार शक्ति का उपयोग न कर विचार की गति को पंग कर डालते हैं। हम स्वयं निज मानसिक शक्ति का उपयोग न कर दूसरे के उदाहरण प्रणाली पर निज जीवन को अधिष्ठित कर देते हैं । हम सोचते हैं कि जो हमारे पूर्वज कर गये हैं, जो हमारे नेतागण चरितार्थ कर रहे हैं जो कुछ हमारे अन्य प्राताओं ने अर्जन किया है, वही हमारा भी साध्य है। उसी को हमें प्राप्त करना चाहिए । हम अपने वातावरण से दासता ही दासता एकत्रित करते हैं । मन में कूड़ा कर्कट एकत्रित करते रहते हैं, कालान्तर में मन का वातावरण कलुषित हो जाता है। हमारा समाज, कभी हमारा गृह, कभी हमारा वातावरण या जीविका उपार्जन का कार्य मानसिक दासता का सहायक बन जाता है तथा हमें दीन दुनियाँ कहीं का भी नहीं छोड़ता । कृत्रिम साधनों द्वारा मन का विकास रुक जाना ही मानसिक दासता है ।

हम मानसिक दासत्व को एक मनोवैज्ञानिक रोग मान सकते हैं । अनेक प्रकार के भ्रम, अभद्र – कल्पनाएँ, निराशा, निरुत्साह इत्यादि मनःक्षेत्र में आत्महीनता की जटिल ग्रन्थि उत्पन्न कर देते हैं । कालान्तर में ये ग्रन्थियाँ अत्यन्त शक्तिशाली हो उठती हैं। फिर दिन प्रतिदिन के विविध कार्यों में इन्हीं की प्रतिक्रिया चलती रहती है। हमारे डरपोकपन के कार्य प्रायः इसी ग्रन्थि के परिणाम स्वरूप होते हैं। अनेक मन गढ़न्त विरुद्ध संस्कार स्मृति पटल पर अंकित रहते हैं। पुरानी असफलताएँ, अप्रिय अनुभव, अव्यक्त मन से चेतन मन में प्रवेश करती हैं तथा प्रत्येक अवसर पर अपनी रोशनी फेंका करती हैं। जैसे एक बारीक कपड़े से प्रकाश की किरणें हलकी-हलकी छन कर बाहर आती हैं उसी प्रकार आत्महीनता तथा दासत्व की ग्रन्थियों की झलक प्रायः प्रत्येक कार्य में प्रकट होकर उसे अपूर्ण बनाया करती है। कभी-कभी मनुष्य की शारीरिक निर्बलता, कमजोरियाँ, व्याधियों, अंग-प्रत्यंगों की छोटाई – मोटाई, सामाजिक परिस्थितियाँ, निर्धनता, देश की कमजोरियों सब मानसिक दासत्व की अभिवृद्धि किया करते हैं । भारत में मानसिक दासत्व का कारण अन्धकार मय वातावरण तथा पाशविक वृत्तियों का अनाचार है । समय-समय पर देश में होने वाले आन्दोलनों से मानसिक दासत्व में भी न्यूनता या अभिवृद्धि का क्रम चला करता है ।

वर्तमान रूप में व्यवहृत हमारा धर्म मानसिक दासता का मित्र बना हुआ है । मनुष्य को मन प्रत्येक तत्व में समझने, मनन करने के लिए प्रदान किया गया है । वह सोच समझ कर प्रत्येक वस्तु ग्रहण करें, यों ही प्रत्येक तत्व को अन्धों की तरह ग्रहण न करे, यही इष्ट है । धर्म के आधुनिक रूप ने मानव मन को अत्यन्त संकुचित, डरपोक बना दिया है। किताब, कलमा, जादू टोना, तीर्थ न जाने कितनी आफतें मानव मन पर सवार हैं । वह धार्मिक श्रृंखलाओं के कारण इधर से उधर, टस से मस नहीं हो पाता । हजार आदमी उसके ऊपर उँगलियाँ उठाने को प्रस्तुत हैं । अतः बेचारे को अन्य व्यक्तियों का अनुकरण करना होता है । अनुकरण अबोध के लिए उपयुक्त हो सकता है किन्तु विवेकशील को उस जंजीर में बाँधने से उसके मनःक्षेत्र प्रबल उत्तेजना उत्पन्न होती है । इस प्रकार मन की गुलामी उत्पन्न होती है ।

जब मन उत्तम तथा निकृष्ट में विवेक न कर सके तो उसे “दास” कहेंगे, उसे तो स्वच्छन्दतापूर्वक निज़ कर्म करना चाहिए। यदि मनुष्य का मन स्वतंत्र रूप से विवेक की शक्ति नहीं रखता, तो वह किसी अन्य शक्ति के वश में अवश्य रहेगा । स्वयं जब मन का इच्छा शक्ति पर प्रभुत्व नहीं तो उस पर किसी विजातीय शक्ति का प्रभुत्व अवश्य रहेगा ।

यदि एक छोटे पौधे को एक शीशी में बन्द कर दें और केवल ‘ऊपर से खुला रहे, तो वह क्रमशः ऊपर ही को बढ़ेगा । उसे इधर- उधर फैलने की गुञ्जायश नहीं है क्योंकि उसे संकीर्ण वातावरण में रख दिया है । इसी प्रकार यदि आप कूपमण्डूक बने रहेंगे, तो मन विकसित न हो सकेगा । वह एकांगी रहेगा तथा उसमें सहृदयता, दयालुता, सत्यवादिता, निर्भीकता या निर्णय शक्ति का विकास न हो सकेगा । मन को छोटे दायरे में बन्द रखने से मनुष्य सब वैभव होते हुए भी अन्तर्वेदना से पीड़ित रहता है । उसमें आत्म सम्मान का प्रादुर्भाव नहीं होता ।

मन को स्वाधीनता दीजिए । उसे चारों ओर फैलने का अवसर दीजिए । मानसिक स्वतंत्रता से ही मनुष्य में दैवी गुणों का प्रादुर्भाव होता है । मन को स्वच्छन्दतापूर्वक विचारने की, मनन करने की स्वतंत्रता दीजिए तो वह आपका सच्चा मित्र, सलाहकार बन जायगा । वह निकृष्ट भोगेच्छाओं में परितृप्त न होगा । वह अन्य व्यक्तियों की कृपा पर आश्रित न रहेगा । मानसिक स्वतंत्रता प्राप्त करते ही मनुष्य का संसार के प्रति दृष्टिकोण बदल जाता है । मानसिक स्वच्छंदता के बिना मनुष्य प्रसन्नचित्त नहीं रह सकता ।

कल्पना कीजिए कि आपको बात-बात पर अन्य व्यक्तियों के इशारों पर नर्तन करना पड़ता है, जहाँ आप तनिक- सी मौलिकता प्रकट करने का प्रयत्न करते हैं कि आपको तीखी डॉट पड़ती है। ऐसी स्थिति में मन परिपक्व नहीं होता। उसकी समस्त मौलिकता नष्ट-भ्रष्ट हो जाती है। वह मन मनुष्य का शत्रु तथा उन्नति में बाधक बन जाता है।

मानसिक परिपुष्टि का मुख्य साधन है- शिक्षा । जिस मस्तिष्क को शिक्षा नहीं मिलती वह थोड़ा-बहुत अनुभव से बढ़कर रुक जाता है । शिक्षा ऐसी हो जिससे मन की सभी शक्तियों-तर्क शक्ति तुलना शक्ति, स्मरण शक्ति, लेखन शक्ति, कल्पना शक्ति का थोड़ा-बहुत विकास हो सके । इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि हम अपनी इच्छानुसार इन सभी शक्तियों को बढ़ा सकते हैं । आवश्यकता है केवल ठीक प्रकार की शिक्षा की । शिक्षा ऐसी मिले कि मनुष्य का विकास उत्तरोत्तर होता रहे, वह रूढ़ियों का गुलाम न बन जावे, अन्यथा मानसिक दासता का फल भयंकर होगा ।

दूसरा साधन है अनुकूल संगति तथा परिस्थितियौं । जिन परिस्थितियों में मनुष्य निवास करता है प्रायः वे ही मानसिक शक्तियाँ उसमें जाग्रत होती हैं। जिस मनुष्य के परिवार में कवि अधिक मात्रा में होते हैं, वह प्रायः कवि होता है । हरे पत्तों में निवास करने वाला कीड़ा हरित वर्ण का ही हो जाता है । अतः पुस्तकों की संगत में रहिए, विद्वानों से तर्क कीजिए, शंकाओं का समाधान कीजिए ।

तीसरा साधन है उपयुक्त मानसिक व्यायाम । जिस प्रकार नियमित व्यायाम से हमारा शरीर विकसित होता है, उसी प्रकार मानसिक व्यायाम (अभ्यास ) द्वारा मन में भिन्न-भिन्न शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है । एकाग्रता का अभ्यास अपूर्व शक्ति प्रदान करता है । खेद है कि अनेक व्यक्ति निज जीवन में एकाग्रता को वह महत्व प्रदान नहीं करते जो वास्तव में उन्हें करना चाहिए । एकाग्रता से कार्य शक्ति बहुत बढ़ जाती है। यदि दृढ़ एकाग्रता रखने वाले व्यक्ति से तुम्हारा साक्षात्कार हो तो तुम्हें अनुभव होगा कि वह पर्वत सद्रश्य  अचल होकर कार्य करता है। तुम उसे छेड़ो चाहे कुछ करो किन्तु वह विचलित न हो सकेगा । इसी का नाम दृढ़ एकाग्रताए है । इसी से मन वश में आ सकता है । मन अभ्यास का दास है । जैसे-जैसे आपका अभ्यास बढ़ेगा, वैसे-वैसे एकाग्रता की वृद्धि होगी । चौथा साधन है- अन्तर्दृष्टि । तुम समाज की रूढ़ियों तथा बिरादरी के गुलाम न बनो । धर्म की रूढ़ि और धर्माचार्यों की लकीरों से पस्त हिम्मत न हो जाओ वरन् अपनी मौलिकता की वृद्धि करो । न कोई मुल्ला, न कोई पण्डित, न राज्य का फैलाया हुआ कुसंस्कारों का जाल, तुम्हें दैवी उच्च भूमिका से हटा सकता है । यदि तुम मन की उच्च भूमिका में निवास करते रहोगे, तो तुम में यथार्थ बल प्रकट होगा ।

विश्व में सब से अधिक महान कार्य मन की शक्तियों को बढ़ाना है । तुम्हारा अभ्यन्तर प्रदेश अनन्त और अपार है । अभ्यास तथा मनन द्वारा तुम अपनी नैसर्गिक शक्ति को प्राप्त कर सकते हो ।

स्मरण रहे, तुम्हें अपना विकास करना है । अल्पज्ञ, निःसत्व नहीं बने रहना है । तुम्हें उचित है कि निज सामथ्र्यों में विश्वास एवं श्रद्धा रखना सीखो । सदा सर्वदा आन्तरिक मन की भावनाओं के प्रति लक्ष दिये रहो । यह मत सोचो कि हमें तो इतना ही विकसित होना है, वरन् यह सोचो कि अब अभिवृद्धि का वास्तविक समय आया है। अपनी विशालता, अतुल सामर्थ्य का चिंतन करो । मानसिक दासता से छुटकारा पाओ और विवेक से काम लेकर संसार में विजयी योद्धा की तरह जीवन व्यतीत करो ।

विवेक हीनता का दुष्परिणाम

जब हमारे सामने अनेक समस्याएँ, विभिन्न प्रकार के विचार होते हैं, तब यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि इनमें कौन हितकारी है और कौन हित के विपरीत, कौन सही है और कौन गलत है । ऐसी अवस्था में विवेक ही हमारा मार्ग दर्शन कर सकता है। जिसमें विवेक की कमी होती है, वे नाजुक क्षणों में अपना सही मार्ग निश्चित नहीं कर पाते और गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं, जिसके कारण उन्हें पतन और असफलता के गर्त में गिरकर लांछित और अपमानित होना पड़ता है। जिनमें विवेक शक्ति का प्राधान्य होता है वे दूरदर्शी होते हैं और इसीलिए उपयुक्त मार्ग को अपनाते हैं । यही शक्ति साधारण व्यक्ति को नेता, महात्मा और युग पुरुष बनाती है।

विवेक प्रत्येक व्यक्ति में जन्मजात रूप से वर्तमान रहता है। इस पर हमारे संचित और क्रियमाण कर्मों की छाया का प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण वह किसी में कम और किसी में अधिक दिखाई देता है। दूसरे शब्दों में इस प्रकार भी कह सकते हैं कि हम अपने संचित एवं क्रियमाण कर्मों से इतने अधिक प्रभावित रहते हैं कि विवेक की पुकार हमें ठीक से सुनाई नहीं पड़ती। यही विवेक हमारी वास्तविक मानवता का प्रतीक और सद्बुद्धि का द्योतक है । इसके अभाव में मनुष्य पशु या उससे भी गया बीता बन जाता है और स्वयं के लिए, समाज के लिए, राष्ट्र के लिए और अन्ततः सृष्टि के लिए एक भार एवं अभिशाप हो जाता है।

मानव हाने के नाते हमारा यह प्राथमिक कर्तव्य है कि हम इस विवेक को जाग्रत करें और उसकी आवाज को सुनना सीखें। संसार में छोटे से छोटे और बड़े से बड़े सभी मनुष्य इसकी कृपा के लिए लालायित रहते हैं ।

इससे हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि मनुष्य के लिए अपने विवेक की सदैव रक्षा करना परमावश्यक है। किसी स्वार्थ के लिए भी विवेक की हत्या करने से उसका कुंफल भोगना पड़ता है। चाहे वैयक्तिक विषय हो और चाहे सामाजिक, चाहे राजनीतिक समस्या हो अथवा धार्मिक, हमको विवेक युक्त निर्णय का सदैव ध्यान रखना चाहिए । लकीर के फकीर बन जाने या “बाबा वाक्यं प्रमाणं” मान लेने से मनुष्य की बुद्धि कुण्ठित हो जाती है और वह गलत मार्ग पर चलने लग जाता है । इसलिए प्राचीन या नवीन कोई भी विषय हो हमको उसका निर्णय उचित-अनुचित, सत्य-असत्य का पूर्ण विचार करके ही करना चाहिए ।

लेखक: पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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