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शांत मन में उतरता है ध्यान

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ध्यान अर्थात स्थिरता, एकाग्रता, तन्मयता । धारणा के प्रवाह में जब मन एक विषय में लय होने लगता है, उसी और बहने लगता है, उसमें लीन होने लगता है तो उसे ध्यान कहते हैं। पतंजलि कहते हैं-तत्र प्रत्ययकतानता ध्यानम्। अर्थात जो हमने धारणा की, उसके साथ मन तादात्म्य होने लगे, मन तदाकार होने लगे, तो समझो ध्यान होने लगा।

प्राय: मन एक स्थान पर रिकता नहीं है। उसका स्वभाव चंचल रहता है। एक क्षण के लिए भी वह कहीं नहीं रुकता है। कभी कोई विचार आता है तो कभी कोई। कभी कोई भाव पैदा होता है तो कभी कोई यादें उसे घेर लेती है। विचार, वृत्ति और स्मृति-इनकी लहरें मन के सरोवर में पैदा होती रहती हैं और ये लहरे हैं कि थमने का नाम ही नहीं लेती। हम जब तक सो नहीं जाते, तब तक कुछ-न-कुछ सोचते ही रहते हैं।

सुबह उठने के बाद से लेकर रात में सो जाने से पहले तक यदि हम अपना मन देखें यानी मन का खेल देखें कि हम क्या करते रहते हैं तो पता चलेगा कि हम कुछ-न-कुछ सोचते रहते हैं। कुछ-न-कुछ चलता रहता है मन में, दिमाग में। जो कुछ हम सोचते रहते हैं, उसके भी विविध रूप होते हैं। कभी हमारे मन में कोई विचार होता है, कभी मन में कोई कल्पना पैदा होती है, कभी मन में कोई चाहत जन्म लेती है तो कभी कोई भाव पैदा होता है। कभी किसी की याद आती है। मतलब अनेक तरह के विचार, अनेक तरह के भाव। ये पैदा होते ही रहते हैं और थमते नहीं हैं। सो जाने के पश्चात रुक जाते हैं, यह हम निश्चित रूप से कह नहीं सकते हैं। इसलिए नहीं कह सकते; क्योंकि यदि सो जाने के बाद ये थम जाते तो सपने क्यों आते? कुछ-न-कुछ मन में चलता रहता है तो सपने भी आते रहते हैं।

यह स्थिति आज से नहीं है, बल्कि जब से हमने होश सँभाला है, जब से जिंदगी जीना शुरू किया है, तब से है। बच्चे तो कई बार सपना देखते हैं और सपने को सच भी मान लेते हैं। जैसे उन्होंने सपने में खिलौने अपने लिए बटोरे।

जो हमारी चाहत होती है, उसी के इर्द-गिर्द हमें सपने आते हैं। बच्चे जागने के बाद खिलौने हते हैं। कहाँ गए खिलौने, अभी तो यहीं रखे थे। उनको मालूम ही नहीं। कि वो सपना देख रहे थे, जिसमें वास्तविकता नहीं थी।

इस तरह हमारा मन आसानी से कहीं टिकता व ठहरता नहीं है। हम सोचते हैं कि मन को ठहराएं। जब ध्यान करने बैठते हैं तो मन में बड़ी खींच-तान होती है। अनेक दिशाओं में मन खिंचा चला जाता है और कई बार हमारा ध्यान इस वजह से थकान में बदल जाता है।

हम धक जाते हैं। क्योंकि सामान्य दशा में हम मन के साथ खींच-तान नहीं करते हैं। मन जो करता है; उसे करने देते: हैं, लेकिन ध्यान में हम सोचते हैं कि ध्यान हमें लगाना चाहिए। इसमें हमारी एकाग्रता होनी चाहिए। उस विषय परहमें एकाग्र होना चाहिए तो हम बड़ी खींच-तान करते हैं। इस तरह ध्यान हमारे लिए विश्राम नहीं, बल्कि धकान बनजाता है।

हम कह सकते हैं कि ध्यान का तो नहीं मालूम लेकिन थोड़ी देर के लिए हमें गहरी नींद आ जाए तो विश्राम: अवश्य मिल जाता है। हमें ताजगी व स्फुर्ति मिलती है, लेकिन ध्यान में ऐसा नहीं मिल पाता है; क्योंकि ध्यान में मन को एकान करने में हम थक जाते हैं। ध्यान में कहते हैं कि बड़ा आनंद आता है, परंतु इस भाग-दौड़ से उपजी थकान में आनंद कैसा? ध्यान में हम कोशिश करने में लगे रहते हैं, लेकिन सच बात यह है कि ध्यान ही एक ऐसौ प्रक्रिया है, एक ऐसी विधि है, जो बिना किसी कोशिश के पूरी होती है। जहाँ कोशिश नहीं, जहाँ कोई श्रम नहीं, केवल विश्राम है और इसमें कुछ करना नहीं है।

जैसे जब हम आसन करते हैं; जब शवासन करते हैं तो हम क्या करते हैं-कुछ करते ही नहीं हैं। लेट जाते हैं, शिथिल हो करके। जब मन शांत होता है तो वह ध्यान में प्रवेश करता है। सामान्य तौर पर हम तन से तो शांत हो जाते हैं, लेकिन मन से कोशिश करते रहते हैं तो विश्राम कहाँ से हुआ? ध्यान वो पल है, ध्यान वो क्षण है, जिसमें हमें कुछ भी नहीं करना है। तन से ही नहीं, मन से भी नहीं। इसमें कोई कोशिश नहीं करनी है। बस, भाव की गहराई में समा जाना है और अपने ही भीतर डुबकी लगा लेनी है। इसलिए ध्यान को हम मन का स्नान भी कह सकते हैं। मन ध्यान के सरोवर में डुबकी लगाकर डूब जाता है।

अगर ध्यान हम करने लगे और हमारा ध्यान लगने लगे तो हमें विश्राम मिलेगा। इससे हमारे शरीर और मन को एक नया जीवन, एक नया उत्साह, एक नई उमंग, नई स्फूर्ति, नई शक्ति, नई ऊर्जा प्राप्त होगी; क्योंकि सारे दिन की उथल-पुथल में हम अपनी ऊर्जा गंवा देते हैं और ध्यान करने से हम पुनः अपनी ऊर्जा को प्राप्त करते हैं और उसका संग्रह कर पाते हैं।

हमको नोंद की आवश्यकता क्यों है? सच पूछो तो नींद सामान्य जनों का ध्यान ही है। जब हम शरीर और मन को शिथिल करके छोड़ देते हैं और सो जाते हैं तो मन सहज रूप से ध्यान की अवस्था में चला जाता है। चूकि सोते समय हम अचेतन में प्रवेश कर जाते हैं, हम जाग्रत नहीं रहते हैं, इसलिए इस ध्यान में प्रवेश का हमें एहसास नहीं होता, लेकिन ताजगी, स्फूर्ति व शांति के रूप में इसका प्रतिफल हमें मिलता है।

आजकल स्थिति यह है कि इस सहज ध्यान का लाभ भी सब लोग नहीं ले पाते क्योंकि नींद भी आजकल मुश्किल हो गई है। मुश्किल इसलिए हो गई है। क्योंकि लोगों को नींद न आने की शिकायत हो गई है। नींद नहीं में आती है। क्योंकि उन्हें चिंताएँ पो रहती हैं और मजे की बात है कि नींद भी आजकल थकान में बदल गई है। वहाँ र पर भी वही सीन-वान चलती रहती है कि मयेरे ये करना है, शाम को ये करना है। दिन भर के विचार उसे घरे रहते हैं और ये विचार हमें मात्र थकाते हैं। १ जिनको अवसाद होता है, उनका मन शांत नहीं होता 1 और विचारों के झोंके बराबर आते हैं। कई बार कभी आते हैं तो कई बार यों ही आ जाते हैं। ऐसा होता है न कि विचारों का एक झोंका सवेरे आया तो एक दोपहर में. और फिर एक शाम को किसी-किसी को मौसम के आधार पर अवसाद होता है। अब सरदी जाने वाली है और गरमी आने वाली है तो अवसाद हो गया। सरदी आने वाली है तो अवसाद । विभिन्न प्रकार के अवसाद देखने को मिलते हैं। और सबका कारण यह है कि हम विचारों से घिरे रहते हैं। उधेड़वन में फंसे रहते हैं और हमें चिंताएं घेरे रहती हैं।

इस तरह के मनोभाव ही हमारे लिए कई बार मनोरोग बन जाते हैं। हमारी असुरक्षा, अनिश्चितता, भय और हमारी चिंताएं-ये हमारे मन पर बोझ बने रहते हैं। इन सबसे मुक्त होकर शांत मन में प्रवेश करना ही ध्यान के सरोवर में स्नान करना है। शांत मन में हम जितनी देर ठहरते हैं, उतनी ही देर हमारा ध्यान होता है और व्यक्तित्व संतुलित होता है। मन शांत हो वहाँ ध्यान उतरता है उसी शांत स्थिति को प्राप्त करने का प्रयत्न हमको निरंतर करना चाहिए।


तीन यात्री पहाड़ की यात्रा परनिकले।मार्ग दुश्वार था, रास्ते में धूप व थकान से उनका गला सूखने लगा। प्यासे यात्रियों की दृष्टि दूर बहते एक झरने पर पड़ी। एक यात्री ने आसमान की ओर मुख किया और भगवान से प्रार्थना करने लगा कि वह बिना किसी प्रयास के झरने तक पहुँच जाए। दूसरे ने मेघों को प्रसन्न करने के लिए स्तोत्र पढ़ना प्रारंभ कर दिया।

तीसरा चुपचाप झरने की तरफ चल पड़ा और कुछ समय की यात्रा के बाद झरने तक पहुँच गया।वहाँ उसने अपनी प्यास बुझाई और आगे की यात्रा पर चल निकला। भगवान भी उनकी ही सहायता करते हैं, जो अपनी सहायता आप करने को तत्पर रहते हैं।

जनवरी, 2021 : अखण्ड ज्योति

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