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आदर्श नेतृत्व और टीम भावना

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किस तरह करें नेतृत्व? यह सवाल प्रत्येक उच्चाकांक्षी मन को मथता है। छोटे बच्चों में कक्षाप्रतिनिधि का मामला हो या महाविद्यालय, विश्वविद्यालयों की क्रीड़ा टीमें, कंपनियों के सरोकार हों या फिर देश और समाज का परिदृश्य; सभी जगह कुशल नेतृत्व की जरूरत महसूस की जाती है। नेतृत्व यदि सशक्त हुआ तो विकास, प्रगति, समृद्धि की बयार बहने लगती है। यदि स्थिति इसके विपरीत हुई तो पहले से की हुई प्रगति, समृद्धि एवं विकास के प्रतिमान ढहते-मिटते चले जाते हैं। िसी भी संस्था, समाज अथवा देश के खंडहर बन चुके ढाँचे को बुलंदियों तक पहुँचाने का आश्चर्यजनक कारनामा कुशल नेतृत्व के हाथों अनायास हो जाता है, जबकि नेतृत्व नाकाम हुआ तो कभी की बुलंदियाँ भी खंडहरों में तबदील हो जाती हैं।

आश्चर्यों को साकार करने वाला, चमत्कारों को आकार देने वाला नेतृत्व विकसित कैसे होता है ? तो जवाब आसान है-व्यक्तित्व में सौमनस्य, सामंजस्य एवं दिशा देने वाले गुणों से। ध्यान रहे कि गुण ही पूजनीय, अनुकरणीय बनते हैं, व्यक्ति नहीं। गुणों का शिखर तक संवर्द्धन व्यक्ति को नेतृत्व के लायक बनाता है। इन्हीं विभूतियों से लोग मार्गदर्शन की, अपनी समस्याओं के समाधान की आशा रखते हैं। यदि कहीं नेतृत्व के नाम पर अधिकार के अहंकार की प्रतिष्ठा हुई तो अधीनस्थ व्यक्ति घुटन की पीड़ा सहन करने के लिए विवश होते हैं। न्हें मार्गदर्शन तो मिलना दूर, रहा-सहा जीवन भी जाता रहता है। अहंकारी और अधिकार के मद में चूर व्यक्ति कभी किसी को प्रेरणा नहीं दे पाता। उसके इर्द-गिर्द रहने वाले भी उसकी चापलूसी तो कर लेते हैं, पर कभी उसके प्रति सच्चा सद्भाव नहीं रखते।

नेतृत्व का आदर्श तो उस व्यक्तित्व में प्रकट होता है, जिसके जीवन का हर आयाम प्रेरक होता है, जिसमें महा साहस की प्रबल ऊर्जा छलकती रहती है, जो उद्देश्य के प्रति पल-पल गलने की क्षमता रखता है, जिसके चरित्र में इतनी सुगंध होती है कि अनुयायी उसकी सौगंध खाते हैं; जो विनम्रता, सदाशयता एवं सहिष्णुता के गुणों से अपनी टीम में सामंजस्य बिठाने की क्षमता रखता है; जो अपनी टीम के हित के लिए अपने बड़े-से-बड़े स्वार्थ की कुरबानी देने के लिए तैयार रहता है। से नेतृत्व के ऊपर सब ओर से सद्भाव और श्रद्धा का अभिषेक होता है। उसका एक इंगित करोड़ों जनों में प्राण फूंक देता है। लक्ष-लक्ष जन उसके शब्दों के जादू के सम्मोहन में डूबे रहते हैं। वह जिधर भी मुड़ता है, उसके पीछे कतारें चल पड़ती हैं।

जीवन के अंतिम वर्षों में परमपूज्य गुरुदेव के हृदय में देश में नेतृत्व के अभाव की गहरी टीस थी। उनकी वेदना उनके शब्दों में छलक जाती थी। वे कहा करते थे-“संस्थाओं की खस्ता हालत, हर छोटी-बड़ी चीज के लिए दूसरों के सामने मुँह ताकता अपना देश। यह स्थिति केवल इसलिए है कि सार्थक नेतृत्व नहीं है। नेतृत्व के अभाव में कुछ नहीं हो सकता।” कार्यकर्ताओं के संबोधन में वे अक्सर कहते थे-“देश को बलिदानी जीवट वाले लोकसेवी चाहिए, जो समाज को दिशा दे सकें।” गुरुदेव के शब्दों में- “नेतृत्व जीवन के क्रियाकलापों से किया जाता है, बातों से नहीं। आज जरूरत है कि व्यक्ति ऐसे बनें; जैसे महात्मा गांधी,सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस जो सिद्धांतों के लिए, हर कुरबानी के लिए पल-पल तैयार रहते थे।”

जरा परखें तो सही स्वयं को, क्या हम उनकी टीस मिटाने के के लिए तैयार हैं। यदि उत्तर हाँ में है तो आगे बढें, अग्रिम पंक्ति में आपका स्थान रिक्त है। बस, इसके लिए हमें सद्गुणों के समुद्र में साहसपूर्वक तैरना होगा। जिस भी दिशा में आप नेतृत्व के लिए आगे बढ़ना चाहते हैं, उस क्षेत्र में आपको श्रेष्ठतम योग्यता के अर्जन के लिए गतिशील होना होगा। यह योग्यता सेवा, चिकित्सा, व्यवस्था, किसी भी क्षेत्र में हो सकती है। योग्यता नेतृत्व का एक आवश्यक गुण तो है, पर इतना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए पर्याप्त साहस और ऊर्जा भी जरूरी है। जिसका अपने सहकर्मियों में संचार हो सके। इस क्रम में यह भी जरूरी है कि हम अपने सहयोगियों के गुणों के विशेष पारखी बनें। उनमें से प्रत्येक के विशिष्ट गुण को पहचानें और इस पहचान को अन्य सहयोगियों को बताएँ। इससे टीम में परस्पर विश्वास बढ़ता है। एकदूसरे के प्रति श्रद्धा एवं सद्भावना पनपती है।

श्रेय और सम्मान के अवसर आने पर स्वयं का एकदम से आगे न बढ़ना ही उचित है। अपने स्थान पर अपने साथियों-सहकर्मियों को यह उपहार देना – चाहिए। ऐसा करने से साथियों के मन में नेतृत्व के प्रति विश्वास बढ़ता है; आस्था अडिग होती है। इसी के साथ जरूरत पड़ती है-प्रेरणा और प्रोत्साहन की। । यह शब्दों से भी होना चाहिए और भावनात्मक कार्यों से भी। इस तरह के शब्द और कार्य सहकर्मियों के मानस को उत्साह से परिपूर्ण कर देते हैं। उनकी भावनाएँ और मजबूत होती हैं। साथ ही कार्यक्षमता में भी अनेक गुना वृद्धि होती है। रस्पर का सामंजस्यऔर मधुर होता है। इस मधुरता को अधिक प्रगाढ़ बनाने के लिए यह भी जरूरी है कि हम अपने साथियों के साथ एकदूसरे की खूबियों की तो चर्चा करें, पर उनकी खामियों का अतिरेक न बखाने; अन्यथा पारस्परिक भावनाएँ विघटित होंगी।

नेतृत्व के लिए एक अन्य गुण, जिसे विकसित किया जाना अनिवार्य है, वह है- नई-नई कार्य-योजनाएँ बनाने एवं उन्हें क्रियान्वित करने की क्षमता का विकास। हम जिस क्षेत्र में भी नेतृत्व कर रहे हैं, उस क्षेत्र में परिस्थिति के अनुरूप संस्था या देश की प्रगति को तीव्रतर बनाने वाली ऐसी कार्य-योजनाएँ तैयार करनी चाहिए, जो समय की कसौटी पर खरी हों। न्हें क्रियान्वित करते समय इनके व्यावहारिक चरणों का ध्यान तो रखा ही जाए; साथ ही इनमें अपने सभी सहकर्मियों की भागीदारी भी सुनिश्चित हो। यदि इन सभी विशेषताओं का क्रमिक अर्जन हम अपने आप में कर सकें तो न केवल हम अपने क्षेत्र को सफल नेतृत्व दे सकेंगे, बल्कि जीवनद्रष्टा भी बनेंगे।

-पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

युग निर्माण योजना

मार्च 2021

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